अध्याय 120

उस आदमी की आवाज़ चुभती हुई, धारदार थी। कटनीस अनायास ही उस दिशा में मुड़ी, उसकी पुतलियाँ सिकुड़ गईं।

बचने का वक्त नहीं था। उसने होंठ भींच लिए और आँखें मूँद लीं; साँस जैसे गले में अटक गई।

लेकिन जिस टक्कर और सड़ांध की उसे उम्मीद थी, वह आई ही नहीं।

उसके बजाय वह एक गर्म, मजबूत बाँहों के घेरे में आ गई—...

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